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श्रीदेवी भारत की पहली महिला मेगास्टार क्यों हैं?

Newspaper: Dainik Bhaskar

Date: 13th August 2021

१३ अगस्त २०२१ को भारत की महानतम अभिनेत्री और पहली महिला मेगास्टार- श्रीदेवी कपूर की ५८ वीं जन्म दिवस  है। उनके आकस्मिक निधन को तीन साल हो चुके हैं, उस घटना ने भारत और दुनिया भर में उनके प्रशंसकों को गहरे सदमे की स्थिति में छोड़ दिया था। श्रीदेवी के प्रशंसक  उनकी अनगिनत देखी और अनदेखी फिल्मों को देखकर उन्हें आज भी याद करते हैं ।

अय्यपन श्रीदेवी नेहरू युग में पैदा हुई थीं । श्रीदेवी का जन्म १९६३ में मद्रास के मेहता हॉस्पिटल में में हुआ । उनकी माता फिल्म नर्तकी राजेश्वरी और पिता अय्यपन वकील थे । उन्होंने अपनी बेटी का नाम भगवान श्री लक्ष्मी जी के नाम पर रखा जो धन, शक्ति और समृद्धि की देवी हैं। श्रीदेवी एक आज्ञाकारी बच्ची थी, जो हमेशा बड़ों के निर्देशानुसार काम करती थी। एक दिन उनकी माँ ने देखा कि श्रीदेवी घर आये मेहमानो की नकल उतारने की एक विशेष प्रतिभा रखती थी, जो मेहमानो के जाने के बाद, उनके स्वर, भाव और अदा को हु बहु अनुकरण करती थी ।

श्रीदेवी को सिनेमा की दुनिया से परिचित कराने के लिए राजेश्वरी में महत्वाकांक्षा  एक ने लिए जन्म लिया। मद्रास जो उस समय दक्षिण भारतीय फिल्मों का केंद्र था, चारों दक्षिणी राज्यों की प्रतिभाओं को अपने फलते-फूलते फिल्म स्टूडियो की ओर आकर्षित करता था । श्रीदेवी को फिल्मों में अपना पहला मौका १९६९ में एक बाल कलाकार के रूप में मिला, जब उन्होंने एम.जी. रामचंद्रन, जे. जयललिता और शाहूकार जानकी जैसे कलाकारों के साथ काम किया । मात्र ६ साल की उम्र में पौराणिक कथा ‘थुनैवन’ (१९६९) में भगवान मुरुगन के रूप में उनके अभिनय ने उन्हें एक प्रसिद्ध बाल अभिनेत्री बना दिया । वह बाल कलाकार के रूप में इतनी प्रसिद्ध हुई की तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ भाषाओं के निर्माता उनकी तारीखों के लिए कतार में लगने लगे।

एक व्यस्त कलाकार के रूप में उनकी शुरुआती फिल्मों को काफी सराहा गया । तमिल में ‘नाम नाडु’ (१९६९), तेलुगु में ‘मा नाना निर्दोशी’ (१९७९), ‘ना थम्मुडु’ (१९७१), मलयालम में ‘पूमपता’ (१९७१), कन्नड़ में ‘भक्त कुंभारा’ (१९७४) से प्रेक्षकों को परिभाषित किया। श्रीदेवी ने फिल्म ‘रानी मेरा नाम’ (१९७२) में एक बाल कलाकार के रूप में हिंदी में शुरुआत की। एक बाल अभिनेत्री के रूप में उनकी आखिरी फिल्म पौराणिक कथा ‘यशोदा कृष्णा’ (१९७५) थी जिसमें उन्होंने भगवान कृष्ण की भूमिका निभाई थी।

एक ऐसा सुस्त दौर आया जब उन्हें न तो बच्चा माना जाता था और न ही वयस्क। श्रीदेवी को कम भूमिकाएं दी जाने लगी और एक नायिका बनना मुश्किल साबित होने लगा । उन्हें तेलुगु फिल्म ‘अनुरागालु’ (१९७५) में एक अंधी लड़की की भूमिका की पेशकश की गई। फिल्म की असफलता ने अग्रणी महिला बनने की उनकी महत्वाकांक्षा को और धीमा कर दिया।

उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब फिल्म निर्देशक के बालचंदर ने उन्हें एक उभरते सितारे कमल हसन और एक नवागंतुक कलाकार रजनीकांत के साथ तमिल फिल्म ‘मूंदरू मुदिचु’ (१९७६) में सेल्वी की भूमिका की पेशकश की। श्रीदेवी ने इस ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म में अपने शानदार अभिनय से एक अभिनेत्री के रूप में अपनी प्रतिभा को पेश किया । तेलुगु फिल्मों के ब्लॉकबस्टर निर्देशक राघवेंद्र राव ने श्रीदेवी को अपने खेमे में लेकर ‘पदहरेला वैसु’ (१९७८) में मुख्य भूमिका दी, जो श्रीदेवी की सुपर हिट तमिल फिल्म ‘१६  वायथिनिले’ (१९७७) का रीमेक था।

इन तीन फिल्मों की सफलता के बाद, श्रीदेवी को आगे चलकर किसी भूमिका, फिल्म, या निर्देशक के लिए फिर कभी संघर्ष नहीं किया। उन्होंने तेलुगु में अभिनेता एन.टी. रामा राव, अक्किनेनी नागेश्वर राव और तमिल में कमल हसन और रजनीकांत के साथ फ़िल्मी जोड़ी बना कर दक्षिण भारत में धूम मचा दी ।

अस्सी के दशक में, उन्होंने अलग अभिनेताओं जैसे की शोभन बाबू और कृष्णा जैसे युवा नायकों के साथ पारिवारिक फिल्मो से मनोरंजन किया । दक्षिण भारतीय फिल्मों में श्रीदेवी का स्टारडम न केवल उनकी असाधारण सुंदरता के कारण था, बल्कि उन्होंने विभिन्न फिल्मों में शानदार प्रदर्शन से दर्शकों के प्यार पर कब्ज़ा कर लिया। कार्तिक दीपम (१९७९), जॉनी (१९८०), प्रेमाअभिषेकम (१९८१), मींदम कोकिला (१९८१), देवता (१९८२) मूनाराम पिरई (१९८२) जैसे फिल्मो से लोगों को अपना दीवाना बना लिया। उन्होंने हिंदी में अपनी किस्मत आजमाई लेकिन उनकी पहली फिल्म ‘सोलवां सावन’ (१९७९) से असफल रही और उनकी हिंदी में सफलता पाने को महत्वाकांक्षा पूरी न हो सकी ।

निर्देशक राघवेंद्र राव ने आगामी फिल्म ‘हिम्मतवाला’ (१९८३) में एक स्थापित नायक जीतेंद्र के साथ एक बार फिर हिंदी में श्रीदेवी की किस्मत आजमाने की पेशकश की। हालांकि वो हिंदी में फिर से काम करने से डरी भी लेकिन उत्तेजित भी थी, श्रीदेवी ने फिल्म को हाँ कर दी और इतिहास रच दिया। फिल्म और गीत ‘नैनों में सपना’ की अपार सफलता ने श्रीदेवी को स्टारडम के शिखर पर पहुंचा दिया। उनकी सफलता का प्रभाव ऐसा था कि फिल्मफेयर पत्रिका ने उन्हें सिर्फ एक फिल्म के साथ हिंदी की "नंबर 1 नायिका" का खिताब दे दिया।

हिंदी सिनेमा एक ऐसे दौर से गुज़र रहा था, जिसमें प्रसिद्ध अभिनेत्रियों शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल द्वारा निबंधित महिलाओं के शक्तिशाली चित्रण देखने को मिलते थे । श्रीदेवी नाम का तूफान आया और उसने वो कर दिखाया जो पहले किसी दक्षिण भारतीय अभिनेत्री ने नहीं किया था। श्रीदेवी ने हिंदी फिल्म की नायिका के अर्थ को बदल दिया और अपने शर्मीले और अंतर्मुखी स्वर से फिल्म जगत के उद्योग की कमान संभाली। श्रीदेवी ने अगले चार वर्षों तक जितेंद्र के साथ अपनी जोड़ी एक " बॉक्स ऑफिस की देवी " की तरह चलायी और फिल्म जगत पर रानी बनकर राज किया।

श्रीदेवी उन भूमिकाओं से नाखुश थीं, जो उन्हें उस समय दी जा रही थीं, हालांकि वह उनकी बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट से रोमांचित थीं। वह तमिल और तेलुगु की तरह हिंदी में अपने अभिनय को साबित करने के लिए भावपूर्ण किरदार निभाना चाहती थीं। किस्मत ने उनका साथ दिया जब एक अज्ञात निर्देशक हरमेश मल्होत्रा ​​​​ने उन्हें सापों से प्रेरित फिल्म ‘नगीना’ (१९८६) में रजनी के किरदार में लिया । श्रीदेवी ने इक्छाधरी नागिन की एक सरल कहानी को अपने विराट अभिनय का प्रदर्शन देते हुए नगीना को उस साल की दूसरी सबसे कामयाब फिल्म बना दिया ।

नगीना की विराट सफलता से श्रीदेवी ने दक्षिण भारत और उत्तर भारत में अपने साम्राज्य को खड़ा किया । उन्होंने बोनी कपूर की ‘मिस्टर इंडिया’ में अपने शानदार अभिनय के साथ समूचे भारत में हंगामा मचा दिया । इस फिल्म में उन्होंने चार्ली चैपलिन के रूप में अपने अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया, "आई लव यू" गीत में मोह लिया और प्रसिद्ध "हवा हवाई" गीत से देश को अपना दीवाना बना दिया । श्रीदेवी का फ़िल्मी साम्राज्य उचाईओं पर तब पंहुचा जब उन्होंने ‘चांदनी’ (१९८९) और ‘चालबाज़’ में अपनी दोहरी भूमिका के साथ भारत को कायल कर दिया ।

उन्होंने दक्षिण भारत में आखरी पोराट्टम (१९८८), जगदेका वीरुडु अतिलोका सुंदरी (१९९०), और क्षनक क्षनम (१९९१) जैसी सफल फिल्मो से अपनी पकड़ बनाये रखी । भारतीय सिनेमा में यह अभूतपूर्व था की किसी अभिनेत्री या अभिनेता ने उत्तर और दक्षिण भारत पर एक ही समय में राज किया हो । श्रीदेवी का हिंदी और तेलुगु फिल्म उद्योगों पर पूर्ण नियंत्रण था। श्रीदेवी से पहले या उनके बाद किसी भी पुरुष या महिला अभिनेता ने यह उपलब्धि हासिल नहीं की है । श्रीदेवी ने भारत में वह कमाल कर दिखाया था जो हर अभिनेता का सपना होता है।

श्रीदेवी की इतनी सफलता को देख कर फिल्म उद्योग जगत ने श्रीदेवी को "भारतीय सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार" घोषित कर दिया ।

श्रीदेवी असाधारण थीं क्योंकि १९९० का दशक फिल्मों में उनका चौथा दशक था और उन्होंने लम्हे (१९९१), खुदा गवाह (१९९२), गुमराह (१९९३), लाडला (१९९४), गोविंदा गोविंदा (१९९४), और जुदाई (१९९७) में अपने अविश्वसनीय प्रदर्शन से लोगों में अमिट चाप छोड़ दी । उन्होंने एक विराम लिया और १९९६ में प्रसिद्ध फिल्म निर्माता बोनी कपूर से शादी कर ली और मार्च १९९७ में जान्हवी कपूर और नवंबर २००० में ख़ुशी कपूर को जन्म दिया।

पंद्रह वर्षों तक, श्रीदेवी ने बोनी कपूर के साथ भारत और विदेशों में उनके शूटिंग के लिए यात्रा की और एक आदर्श माँ के रूप में अपने बच्चों को उनके प्रारंभिक वर्षों के दौरान देखभाल प्रदान की। २००४ में, उन्होंने सहारा टीवी की ‘मालिनी अय्यर’ के साथ टेलीविजन जगत में कदम रखा और २००९ में पहली बार एक फैशन शो के लिए रैंप वॉक किया।

२०१२ में, श्रीदेवी ने ‘इंग्लिश विंग्लिश’ के साथ एक वैश्विक मंच पर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया, जिसमें उन्होंने शशि की भूमिका निभाई, जो अंग्रेजी नहीं जानने की वजह से अपमानित महसूस करती है और अमेरिका में एक गुप्त क्रैश कोर्स में भाग लेती है । इंग्लिश विंग्लिश की सफलता के साथ उन्होंने भारतीय सिनेमा में किसी अभिनेत्री की अब तक की सबसे बड़ी फिल्म वापसी का एक नया रिकॉर्ड कायम किया ।

वापसी के बाद श्रीदेवी को एक मेगास्टार के रूप में सम्मानित किया गया। माधुरी दीक्षित ने डांस शो 'झलक दिखला जा' में उन्हें "सुपरस्टार के बीच मेगास्टार" के रूप में पेश किया। वह ४९ साल की थीं और फिर से सफलता के शिखर को छू रही थी । उनके पास जीने के लिए केवल ६ साल और बचे थे।

पति और बच्चों के सहयोग से उन्होंने तमिल फिल्म ‘पुलि’ (२०१५) और हिंदी फिल्म ‘माँम’ (२०१७) में काम किया । माँम के लिए उन्हें सव्रश्रेठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया ।

महान श्रीदेवी के प्रशंसक उनको और फिल्मो में देखने के लिए तरस रहे थे, लेकिन भगवान ने हस्तक्षेप किया और २४ फरवरी २०१८ को उन्हें स्वर्ग में वापस बुला लिया जब वे परिवार की एक शादी के बाद दुबई में थीं। भारत के राष्ट्रपति से लेकर असहाय आम आदमी तक समूचा देश और विश्व में श्रीदेवी के प्रशंसक शोक में डूब गए । उनके अंतिम संस्कार में दुनिया भर से बड़ी भीड़ शामिल हुई जो एक आखिरी बार अपनी पसंदीदा अभिनेत्री की एक झलक देखना चाहते थे।

अपने जीवनकाल के दौरान और बाद में उन्हें जो पुरस्कार और पहचान मिली, वह लोगों के प्यार के सामने कुछ भी नहीं था । देश की प्रशंसा उनका सबसे बड़ा पुरस्कार था, क्योंकि फिर श्रीदेवी की जैसी अदाकारा का जनम लेना असंभव है । श्रीदेवी एक मेगास्टार थी जिन्हे दर्शकों ने अपने परिवार के सदस्य की तरह प्यार किया है और करते रहेंगे ।